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वर्चुअल समाज और हमारी जिम्मेदारियाँ

कुछ बाते करने को जी चाह रहा है पर अभी कोई मित्र सामने नही बस कम्प्यूटर सामने है और मेरा क्रियेट ब्लॉग इंट्री खुला है। मैने सोचा ... चलो यूँ ही कुछ लिखते है ... अरे नही नही कहते हैं ।
आजकल बहुत सारे सोशल नेटवर्किंग साईट्स उपलब्ध हैं जिनमे लोग अपनी एक दुनिया बनाने और तलाशने लगे हैं । रोज एक नया रिश्ता बन और बिगड़ रहा है । एक होड़ सी लगी है मित्रो की संख्या बढ़ाने कि बिना यह जाने , सोचे और समझे कि वाकई वो आपके लायक या आप उसके लायक या काबिल है भी कि नही । लोग अपनी सही पहचान तक जाहिर नही करते अक्सर और वर्चुअल दुनिया मे मस्त हो जाते हैं । लाईक और कमेंट्स के लिये तो लोग जैसे पागल होते जा रहे हैं ।

Religions

Hinduism

कोशिश

सेतुबन्ध था हो रहा और राम खड़े निहार ,
सोच रहे थे व्यापकता थी उदधि की अपरम्पार ।
याद आया वो समय याचना की थी बारम्बार ,
किंतु बिना भय प्रकटा नही सिन्धु वहाँ साकार ॥

सोच रहे हा ! सीता सुकुमारी मैं हूँ कितना लाचार ,
ब्रम्हाण्ड पलटने की शक्ति पर मर्यादा का बिचार ।
तारतम्य टुटा तभी औचक हीं कुछ निहार ,
एक गिलहरी तन्मयता से डाल रही कंकड़ हर बार ॥

उठा लिया प्रभु ने हाथोँ पर और किया दुलार ,
पुछा क्यूँ री ! ऐसे क्या तूँ बाँध लेगी जलराशि अपार ।

एक स्वप्न

एक स्वप्न देखा था कभी , जो आज हर धड़कन में हैं ।
एक नया भारत बनाने का इरादा मन मे हैं ॥

एक नया भारत कि जिसमे एक नया विश्वास हो ,
जिसकी आँखों मे चमक हो एक नया उल्लास हो ,
हो जहाँ सम्मान हर एक जाति हर एक धर्म का ,
सब समर्पित हों जिसे वो लक्ष्य जिसके पास हो ।

एक स्वप्न देखा था कभी , जो आज हर धड़कन में हैं ।
एक नया भारत बनाने का इरादा मन मे हैं ॥

एक नया भारत कि जिसमे प्यार हो सुख शांति हो ,
सबके हाथों में कलम ही एक मात्र हथियार हो ,
जीते जाते हों जहाँ दिल जान को भी वार के ,
खुद से पहले औरों का सुख कर्म ही निष्काम हो ।

एक स्वप्न देखा था कभी , जो आज हर धड़कन में हैं ।

नदी

सुनो सुनो मेरी कहानी , मैं नदी मस्तानी ।
लगती हूँ जानी पहचानी , फिर भी हूँ अंजानी ॥
ज़हर बनाते हो तुम जिसको , था अमृत वो पानी ।
बाँधते हो जिसको थे पूजते , उसको हर नर नारी ॥

बूँदों से मैं बनी और , पर्वत से हूँ झरी ।
मुश्किल राहों मे भी मैं , राह बनाती चली ॥
जो अड़े बहे जो झुके उन्हे , सहलाती मैं चली ।
बही दूर तक और अंत मे , सागर से जा मिली ॥

कितने गाँव, नगर, सभ्यता , बसती और उजड़ती रही ।
और सीँचती उनको मैं , अनवरत बहती रही ॥
भेदभाव प्राणी - प्राणी में , मैने कभी किया नही ।
जो भी आया अमृत देने में , संकोच तनिक भी किया नही ॥

कन्यादान

Shaadiदान करे क्या कोई दुनिया में,

जैसा दान किया मैंने,

दिल का एक टुकरा ही दे डाला,

अहा! ये कैसा दान किया मैंने!

 

जिस बेटी को जब ठेस लगी,

एक तीस उठी मेरे दिल से!

आज दिल पर पत्थर रख कर,

उसी बेटी को दान किया मैंने,

यह कैसा दान किया मैंने!

 

बेटी क्या एक सहारा थी,

सारे घर का उजियारा थी,

आज घर में अँधियारा है,

दिये को दान किया मैंने,

यह कैसा दान किया मैंने!

यादोँ का कारवाँ

हम याद आयेँ ना आयेँ , आप याद आयेँगे ,
साथ गुजारे गए मधुर स्मृतियों के सुहाने पल ,
सपनों और विचारों की लड़ी के दरमियाँ ,
चुपके से दाखिल हो साथ - साथ हो जायेंगे ।

आपने चुन रखा है आस्मां उड़्ने के लिये ,
वक्त की रेत पर हर्फ़ लिखने के लिये ,
हमने भी देख रखा है सपनों का एक कारवाँ ,
दौड़ पड़े है हम भी शामिल होने के लिए ।

वक्त का तक़ाजा है , दस्तूर है सुने ,
मिल के बिछड़ने का किस्सा है सुने ,
ये जो दूरी है जरुरी है , पुनः मिलन के दरमियाँ ,
मिलन की ताजगी बरकरार रखने के लिए ।

विश्वास का रखियेगा ख्याल हम कहीँ भी रहे ,
पुनः मिल सके न सके , दिल ज़रूर मिले ,

Frames of Mind - Theory of Multiple Intelligences

Howard Gardner in his book titled Frames of Mind - Theory of Multiple Intellignecies published in 1983, challenged the notion that there existed a single human intelligence / single general capacity for logical thinking, reasoning and use of language. He aserted that the traditional definition of intelligence which focuses mainly on the ability to use language and to reason logically or mathematically is too narrow. It fails to measure large areas of human endeavour or brilliance.

..............कर्मण्ये वाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन ..........

Gita Updeshवेदव्यास के अतिरिक्त गीता के चार श्रोता थे और दो वक्ता | श्रोता थे अर्जुन , संजय , ध्रितराष्ट्र , और बरबरी एवं वक्ता थे कृष्ण और संजय | बरबरी भीम के पुत्र घटोत्कच का पुत्र था जो यहाँ उतना प्रासंगिक नही हैं | गीता के बारे में सभी ऐसा सोचते हैं की कृष्ण ने गीता अर्जुन को युध्द के लिए प्रेरित करने के लिया कही थी पर वास्तव में यह युध्द रोकने का कृष्ण का अंतिम प्रयास था | यहीं ध्रितराष्ट्र और संजय प्रासंगिक हो जाते हैं | गीता वस्तुतः कर्त्तव्य पथ से विचलित

प्राणी , परमाणु और सपने

Nuclear Bomb Explosion.....और चौबीस साल बाद भी वहाँ के लोग उस घटना को भुले नही हैँ । बड़े बुढ़े अपने नातियोँ पोतोँ को सुनाते हैं कि किस तरह धरती डोली थी धूल और धुएँ के गुब्बार उड़े थे । कुछ लोगों के शरीर पर तो रेडियो सक्रिय धूल के प्रभाव आज भी स्पष्ट हैं ।