कोशिश

सेतुबन्ध था हो रहा और राम खड़े निहार ,
सोच रहे थे व्यापकता थी उदधि की अपरम्पार ।
याद आया वो समय याचना की थी बारम्बार ,
किंतु बिना भय प्रकटा नही सिन्धु वहाँ साकार ॥

सोच रहे हा ! सीता सुकुमारी मैं हूँ कितना लाचार ,
ब्रम्हाण्ड पलटने की शक्ति पर मर्यादा का बिचार ।
तारतम्य टुटा तभी औचक हीं कुछ निहार ,
एक गिलहरी तन्मयता से डाल रही कंकड़ हर बार ॥

उठा लिया प्रभु ने हाथोँ पर और किया दुलार ,
पुछा क्यूँ री ! ऐसे क्या तूँ बाँध लेगी जलराशि अपार ।
वानर वीरोँ के पैरों से कुचली जायेगी स्वर्ग सिधार ,
बड़े - बड़े पत्थर तिरतेँ हों कहाँ वहाँ कंकड़ आकार ॥

कहा नमन कर गिलहरी ने कोशिश की महत्ता अपार ,
भूमिका मेरी ये छोटी सी न्यून भले सम्मुख आकार ।
किंतु तरी हाथोँ में प्रभु के मेहनत गई नही बेकार ,
कृपा सिन्धु मुसकाय कहा याद करेगा तुमको संसार ॥

ऐसी हीं कुछ कोशिशेँ करनी है हम सबको हर बार ,
मिटे भले ना ये कुत्सित हैं जटिल जाल जो भ्रष्ट्राचार ।
अपनी नजरोँ में ना गिरने का जो सुख हैं अविचल अभिराम ,
हैं यही भूमिका सही हमारी सम्मुख भ्रष्ट्राचार ॥

-------------- अश्विनी कुमार तिवारी ( 28.10.2010 )