नदी

सुनो सुनो मेरी कहानी , मैं नदी मस्तानी ।
लगती हूँ जानी पहचानी , फिर भी हूँ अंजानी ॥
ज़हर बनाते हो तुम जिसको , था अमृत वो पानी ।
बाँधते हो जिसको थे पूजते , उसको हर नर नारी ॥

बूँदों से मैं बनी और , पर्वत से हूँ झरी ।
मुश्किल राहों मे भी मैं , राह बनाती चली ॥
जो अड़े बहे जो झुके उन्हे , सहलाती मैं चली ।
बही दूर तक और अंत मे , सागर से जा मिली ॥

कितने गाँव, नगर, सभ्यता , बसती और उजड़ती रही ।
और सीँचती उनको मैं , अनवरत बहती रही ॥
भेदभाव प्राणी - प्राणी में , मैने कभी किया नही ।
जो भी आया अमृत देने में , संकोच तनिक भी किया नही ॥

कभी – कभी मनमर्जी से तोड़ , किनारे भी बही ।
और पलट मिट्टी की किस्मत , सिमट आप मे ही गई ॥
रखती हूँ मैं स्वच्छ जगत , और धरा को हरी-भरी ।
जग के विकास की, जीवन की , मैं हीं हूँ मुख्य कड़ी ॥

नदी नार की गति एक सी , कहते हैं ये ज्ञानी ।
पैदा हुई जहाँ वहाँ ये , काम नही हैं आती ॥
जीवन दोनो का हैं अर्पण , बस दूजे की थाती ।
नार पिया से और नदी , सागर से जा मिलती ॥

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अश्विनी कुमार तिवारी (12.05.2010)