भ्रष्टाचार निवारण मे हमारी भुमिका........

जब से सोचने लगा हुं क्या हो भूमिका ,
हमारी भ्रष्ट्राचार के निवारण मे ।
दिल और दिमाग उलझ के रह गये ,
अजीब से उलझन के ताने - बाने में ॥
पहले प्रश्न उठा कि बला क्या है ये ?
निवारण जिसका चाहते सब पर होता नही ।
कौन हैं वो अज्ञात सर्वव्यापी अविनाशी ,
लिप्त है सभी कर्मचारी अधिकारी या सन्यासी ॥
क्या हैं वो कि सब छटपटाते है निकलने को ,
पर और धसते जा रहे जैसे कि फँसे दलदल मे ।
कभी लगता कि जैसे मदिरा लगती है ,
पीने मे मजा और भी आता है डूब जाने मे ॥
फिर तोड़ा शब्द तो चला पता कि 'च्युत होना -
आचार से ही ' हैं भ्रष्ट्राचार कहलाता ।
फिर ढ़ूढ़ा कि शायद कहीं आचार पड़ा हो कर्यालय मे ,
कि मानदण्ड तो मिले भ्रष्ट्राचार पहचानने मे ॥
पर हो गया विवश कि भ्रष्ट्राचार बहुत है गिनाने को ,
आचार एक भी नही भुले से है अपनाने को ।
क्योकि जो समझते घर मे आचार सही ,
गिनती मे कार्यालय के भ्रष्ट्राचार हो सकता है वही ॥
सबके अपने मापदण्ड अपने चोँचले है तो सही ,
पर कार्यालय मे काम का व्यस्थित तरीका हि नही ।
तो जहाँ तय हि ना हो आचार कार्यालय में ,
क्या हो हमारी भूमिका वहाँ भ्रष्ट्राचार निवारण मे ॥
_______ अश्विनी कुमार तिवारी
( 14.03.2010 )