वर्चुअल समाज और हमारी जिम्मेदारियाँ

कुछ बाते करने को जी चाह रहा है पर अभी कोई मित्र सामने नही बस कम्प्यूटर सामने है और मेरा क्रियेट ब्लॉग इंट्री खुला है। मैने सोचा ... चलो यूँ ही कुछ लिखते है ... अरे नही नही कहते हैं ।
आजकल बहुत सारे सोशल नेटवर्किंग साईट्स उपलब्ध हैं जिनमे लोग अपनी एक दुनिया बनाने और तलाशने लगे हैं । रोज एक नया रिश्ता बन और बिगड़ रहा है । एक होड़ सी लगी है मित्रो की संख्या बढ़ाने कि बिना यह जाने , सोचे और समझे कि वाकई वो आपके लायक या आप उसके लायक या काबिल है भी कि नही । लोग अपनी सही पहचान तक जाहिर नही करते अक्सर और वर्चुअल दुनिया मे मस्त हो जाते हैं । लाईक और कमेंट्स के लिये तो लोग जैसे पागल होते जा रहे हैं ।
और जैसा हर समाज मे होता है यहां भी असमाजिक तत्व सक्रिय है और इस समाज को भी दूषित कर रहे हैं ।
ऐसा भी नही कि अच्छे लोग नही है .. हैं ! जरूर हैं ! पर सामान्य समाज की तरह यहां भी उनकी आवाज नक्कारखाने मे तुती की तरह हैं ।
बिभिन्न देशों कि सरकारे इन साईटों पर नजर रख रही हैं । कोशिश चल रही है इस दुनिया के लिये भी कानून बनाने कि और अभिव्यक्ति की असिमित स्वतंत्रता या यूँ कहें उनकी नजर में स्वक्षन्दता को सिमित करने के लिये ।
कोई भी समाज जब निर्मित होना शुरू होता है तो सब उसमे अच्छाई ही लाना चाहते है और एक सच्चा आदर्श स्थापित करने की मंसा भी होती है पर ज्यों ज्यों समय बीतता है कुरीतियाँ भी धीरे धीरे घर करने लगती है .... धीरे धीरे वाकई ऐसा समय आता है जब समाज के पुनर्जागरण की आवश्यकता होती हैं । ऐसा लगता है कि सोशल नेटवर्किग साईट्स के लिये भी वो समय आ गया है कि इसके सभी प्रक्रिया के पुनरिक्षण की आवश्यकता आन पड़ी है । हम सब जो आज इस वर्चुअल समाज के भी हिस्सा है एक बार पुनः सोचना होगा कि हमारी आजादी सुरक्षित रहे और इसका पहला कदम ये होना चाहिये कि हम अपनी स्वक्षन्दता छोड़ें और जब भी कुछ कहे और शेयर करें अपने विवेक और अपने समाज और देश कि गरिमा का ध्यान रखते हुए करें । और एक सामन्य सा टेस्ट कर लें जिसे माँ परिक्षण कहते हैं । यह परिक्षण कहता है कि आप कुछ भी कहने और करने से पहले ये सोचें कि यदि आपकी माँ आपको ये कहते , करते देखें या सुने तो क्या वह उन्हे स्वीकार्य होगा । यदि जबाब हाँ है तो फिर आप आगे बढ़ें और यदि जबाब ना हैं तो फिर रुक जायें । मेरा ऐसा मानना है कि कमसे कम आपके 80 से 90 प्रतिशत कदम इस परिक्षण से सही ही पड़ेंगे । आप जरूर आजमाएं । आप पिता परिक्षण भी अपना सकते हैं अपने विवेक के अनुसार । जटिल स्थितियों मे दोनो परिक्षण से गुजरें ।
आपकी अभिव्यक्ति सुरक्षित रहे ये आपका हक़ हैं अधिकार है पर ये दूसरों के लिये कष्ट का कारण ना बने ये आपका कर्तव्य हैं । और आप सब ये काफी बेहतर तरीके से समझते हैं कि बिना कर्तव्य के अधिकार बिलकुल बेमाने हैं ।
आइये हम अपने सोशल नेटवर्किंग साईट्स और इंटरनेट जसे माध्यमों कि स्वतंत्रता बनाये रखने में अपना योगदान दें ।

--------- अश्विनी कुमार तिवारी ( 21.05.2012)